रावण के नानाओं का रहस्य: कैसे बने तीनों भाई इतने शक्तिशाली कि देवता भी डर गए!

रावण के नानाओं माल्यवान सुमाली माली की कथा और स्वर्ण लंका
रावण के नानाओं का रहस्य – माल्यवान सुमाली माली की पूरी कहानी

रावण के नानाओं का जन्म: तीन राक्षस भाइयों की अद्भुत कथा

रामायण की कथाओं में रावण जितना प्रसिद्ध है, उतना ही महत्वपूर्ण उसके नानाओं- माल्यवान, सुमाली और माली का योगदान भी माना जाता है। यही वे तीन महाशक्तिशाली राक्षस थे, जिनकी वजह से आगे चलकर लंका का वैभव और राक्षसों का प्रभाव तीनों लोकों में फैल गया। आइए इस रहस्यमयी कथा को विस्तार से जानते हैं। {getToc} $title={Table of Contents}

सुकेश को मिला वरदान और विवाह

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पूर्व कथा के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती ने राक्षस पुत्र सुकेश को अद्भुत वरदान प्रदान किए, तब वह अत्यंत तेजस्वी और प्रभावशाली बन गया। उसकी दिव्य शक्ति और धर्मपरायणता को देखकर गंधर्व ग्रामणी अत्यंत प्रभावित हुए।

ग्रामणी ने अपनी रूपवती और लक्ष्मी के समान दिव्य पुत्री देववती का विवाह सुकेश के साथ कर दिया। देववती की सुंदरता तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी। योग्य पति पाकर वह उतनी ही प्रसन्न हुई, जैसे किसी निर्धन को अचानक अपार धन मिल जाए।

देववती के साथ रहते हुए सुकेश का तेज और भी बढ़ गया, जैसे विशाल हाथी के साथ हथिनी की शोभा बढ़ जाती है।

तीन तेजस्वी पुत्रों का जन्म

समय बीतने पर देववती ने अग्नि के समान तेजस्वी तीन पुत्रों को जन्म दिया-

  • माल्यवान
  • सुमाली
  • माली

ये तीनों भाई बल, पराक्रम और शक्ति में अद्वितीय थे। शिव के समान प्रभावशाली इन पुत्रों को देखकर राक्षसराज सुकेश अत्यंत प्रसन्न हुआ।

उनका तेज अग्नि के समान प्रखर, स्वभाव उग्र और शक्ति तीनों लोकों को कंपा देने वाली थी। जैसे उपेक्षित रोग बढ़ता है, उसी प्रकार समय के साथ उनकी शक्ति भी निरंतर बढ़ती गई।

मेरु पर्वत पर घोर तपस्या

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जब तीनों भाइयों को ज्ञात हुआ कि उनके पिता ने कठोर तपस्या से वरदान प्राप्त किया था, तो उन्होंने भी महान शक्ति पाने का निश्चय किया।

वे तीनों मेरु पर्वत पर गए और कठोर नियमों का पालन करते हुए घोर तप करने लगे। उनकी तपस्या इतनी भयंकर थी कि-

  • देवता भयभीत हो गए
  • असुर चिंतित हो उठे
  • मनुष्य लोक में भी हलचल मच गई
  • उनकी तपस्या से तीनों लोक संतप्त होने लगे।

ब्रह्मा जी से मिला अजेय होने का वरदान

अंततः उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर प्रजापति ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि वे वर देने आए हैं।

तीनों भाइयों ने विनम्र होकर प्रार्थना की-

“हे देव! हमें शत्रु-विजयी, अजेय और दीर्घायु होने का वर प्रदान करें, तथा हम तीनों में सदा प्रेम और एकता बनी रहे।”

ब्रह्मा जी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए कहा- “ऐसा ही होगा।”

वरदान पाते ही तीनों राक्षसों का साहस कई गुना बढ़ गया और वे निर्भय होकर देवताओं तथा ऋषियों को सताने लगे।

स्वर्ण लंका की स्थापना का रहस्य

उत्साह से भरकर एक दिन तीनों भाइयों ने देव शिल्पी विश्वकर्मा से भव्य नगर बनाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि उनके लिए शिव भवन के समान दिव्य निवास बनाया जाए।

तब विश्वकर्मा जी ने उन्हें दक्षिण समुद्र तट पर स्थित त्रिकूट पर्वत के मध्य बनी एक अद्भुत नगरी के बारे में बताया- स्वर्णमयी लंका।

उन्होंने बताया-

  • यह नगरी सौ योजन लंबी और तीस योजन चौड़ी थी
  • चारों ओर स्वर्ण प्राचीर (दीवारें) थीं
  • भव्य स्वर्ण द्वार बने थे
  • इसकी सुरक्षा इतनी मजबूत थी कि पक्षी भी प्रवेश न कर सके

विश्वकर्मा ने बताया कि यह नगरी उन्होंने पहले इंद्र की आज्ञा से बनाई थी।

लंका में राक्षसों का वैभव

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विश्वकर्मा के निर्देशानुसार माल्यवान, सुमाली और माली अपने अनुचरों सहित लंका पहुँचे और वहाँ रहने लगे।

स्वर्ण महलों, मजबूत किलों और भव्य प्रासादों से युक्त लंका को देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए। यहीं से राक्षसों की शक्ति और प्रभाव तीनों लोकों में फैलने लगा- और आगे चलकर इसी वंश में जन्म हुआ लंकापति रावण का।

निष्कर्ष:

रावण के नानाओं - माल्यवान, सुमाली और माली - की यह कथा हमें बताती है कि लंका का वैभव और राक्षसों की शक्ति अचानक नहीं बढ़ी थी। इसके पीछे कठोर तपस्या, प्राप्त वरदान और सुव्यवस्थित नगर निर्माण का बड़ा योगदान था।

इन्हीं तीन भाइयों की विरासत ने आगे चलकर रावण को वह साम्राज्य दिया, जिसने देवताओं तक को चुनौती दी।

JAY PANDEY

दोस्तों, नमस्कार, मैं JAY PANDEY एक ब्लॉगर हूं, जो 2015 से ब्लॉगिंग कर रहा हूं। मैं इतिहास, धर्म, जीवनी, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य आदि विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला को कवर करुंगा। मेरा मिशन अपने पाठकों को सटीक और अच्छी तरह से शोध की गई जानकारी प्रदान करना है।धन्यवाद!

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