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| वैश्रवण कुबेर की तपस्या, पुष्पक विमान और लंका नगरी का दृश्य |
भूमिका
हिंदू धर्म में धन के देवता के रूप में पूजे जाने वाले “कुबेर” को आज भी समृद्धि और वैभव का प्रतीक माना जाता है। दीपावली, धनतेरस और विशेष पूजा-पाठ में उनकी आराधना की जाती है।
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कुबेर का जीवन केवल धन और वैभव से भरा नहीं था। उन्होंने कठोर तपस्या की, संघर्ष झेला और यहां तक कि अपनी ही नगरी लंका को भी खोया।
कुबेर का वास्तविक नाम वैश्रवण था और वे लंका के पहले राजा थे। आज हम उनकी पूरी जीवन यात्रा को विस्तार से जानेंगे।
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भगवान श्री राम और अगस्त्य मुनि का संवाद
वनवास के समय भगवान “राम” ने महर्षि “अगस्त्य” से लंका के इतिहास के बारे में पूछा।
अगस्त्य मुनि ने कुबेर और रावण की पूरी कथा सुनाई।
यह कथा हमें मुख्य रूप से “रावण संहिता” में मिलती है।
वैश्रवण का जन्म और वंश परंपरा
वैश्रवण का जन्म महर्षि “विश्रवा” के घर हुआ था। उनके पिता महान ऋषि और वेदों के ज्ञाता थे।
उनके पितामह थे महर्षि “पुलस्त्य”, जो सप्तऋषियों में से एक माने जाते हैं।
जन्म से ही वैश्रवण में:
- बुद्धिमत्ता
- संयम
- तपस्वी स्वभाव
- धर्मप्रियता
जैसे गुण विद्यमान थे। वे सांसारिक सुखों से दूर रहते थे और ईश्वर की भक्ति में लीन रहते थे।
कठोर तपस्या का प्रारंभ
युवावस्था में पहुंचकर वैश्रवण ने जीवन का उद्देश्य तय कर लिया, तपस्या द्वारा देवत्व प्राप्त करना।
उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल जल पीकर जीवन बिताया।
फिर केवल वायु पर निर्भर रहे, अंत में पूर्ण उपवास किया। धूप, वर्षा और शीत सहन किया।
उनकी तपस्या इतनी कठिन थी कि देवता भी आश्चर्यचकित हो गए।
ब्रह्मा जी का वरदान
वैश्रवण की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं "ब्रह्मा जी" देवताओं के साथ प्रकट हुए।
उन्होंने कहा:
“वत्स! तुम्हारी तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। वर मांगो।”
वैश्रवण ने कभी धन या शक्ति नहीं मांगी। उन्होंने कहा:
“मैं लोक की रक्षा करना चाहता हूँ। मुझे लोकपाल बनने का वरदान दीजिए।
यह सुनकर ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए।
कुबेर और लोकपाल पद की प्राप्ति
ब्रह्मा जी ने वैश्रवण को:
चौथा लोकपाल और नौ निधियों का स्वामी नियुक्त किया
“कुबेर” की उपाधि प्रदान की
इस प्रकार वे यम, वरुण, इंद्र के समान देवता बन गए।
अब वे केवल ऋषि पुत्र नहीं, बल्कि देवताओं में गिने जाने लगे।
पुष्पक विमान का वरदान
ब्रह्मा जी ने कुबेर को एक दिव्य पुष्पक विमान भी दिया।
पुष्पक विमान की विशेषताएं:
- बिना चालक चलता था
- इच्छानुसार उड़ता था
- स्वर्ण से निर्मित था
- अत्यंत तेजस्वी था
यह विमान आगे चलकर रामायण में भी अत्यंत प्रसिद्ध हुआ।
लंका नगरी का चयन
कुबेर के पास अब शक्ति और वैभव था, लेकिन निवास स्थान नहीं। उन्होंने अपने पिता विश्रवा से मार्गदर्शन मांगा।
उन्होंने कहा हे तात! मैने ब्रह्मा जी से अभीष्ट वर प्राप्त किया है। परन्तु उन्होंने मेरा कोई निवास स्थान नहीं बताया।
अतः आप ही मेरे लिए निवास स्थान का चयन करें जहां मेरे रहने से किसी भी प्राणी को कोई कष्ट न हो।
तब देवों के समान विश्रवा ने उन्हें त्रिकूट पर्वत पर स्थित लंका नगरी के बारे में बताया।
विष्णु जी के भय से असुरों का लंका से पलायन
उन्होंने कहाi- हे वत्स! मेरी बात ध्यान से सुनो।
पूर्वकाल में जब असुरों का अत्याचार बढ़ा, तब भगवान विष्णु ने उनका संहार करने का सोच असुरों से युद्ध किया।
जिससे असुर अस्त व्यस्त हो गए और भगवान श्री हरि के भय से वे लंका छोड़कर रसातल चले गए थे।
तभी से लंका सुनी पड़ी है अतः यहां तुम्हारे रहने से किसी को कोई कष्ट नहीं होगा।
अतः अब तुम वहां जाकर लंका नगरी को अपना निवास स्थान बनाओ।
इसी कारण यह नगरी कुबेर के लिए उपलब्ध हुई थी।
लंका की विशेषताएं:
- विश्वकर्मा द्वारा निर्मित
- स्वर्ण से जड़ी हुई
- चारों ओर सुरक्षा कवच
- समुद्र से घिरी
पहले यह असुरों की नगरी थी, लेकिन विष्णु के भय से वे इसे छोड़ चुके थे।
लंका में कुबेर का स्वर्ण युग
कुबेर देव ने ब्रह्मा जी के समान अपने पिता को प्रणाम किया और लंका नगरी की तरफ चल दिए।
कुबेर लंका पहुंचे और वहां शासन स्थापित किया।
कुछ ही दिनों में वीरान पड़ी लंका नगरी फिर से हरी-भरी हो गई।
कुबेर जी के शासन में उनके साथ आए लोग भी अत्यंत सुखी और खुशहाल रहते थे।
उनके शासन में:
- प्रजा सुखी थी
- अपराध नहीं थे
- व्यापार बढ़ा
- समृद्धि फैली
- धर्म का पालन हुआ
लंका धीरे-धीरे स्वर्ग के समान बन गई।
अप्सराएं नृत्य करती थीं, देवता आते-जाते थे और चारों ओर वैभव था।
वहीं से वे:
- देवताओं के कोषाध्यक्ष बने
- धन का वितरण करने लगे
- संसार में समृद्धि फैलाने लगे
आज भी उन्हें धन का राजा माना जाता है।
कुबेर की कथा से मिलने वाली शिक्षा
कुबेर की कहानी हमें कई महत्वपूर्ण बातें सिखाती है:
तपस्या का महत्व:
बिना परिश्रम और संयम के कोई बड़ा पद नहीं मिलता।
धर्म का मार्ग:
कुबेर हमेशा धर्म के मार्ग पर चले।
वैभव अस्थायी है:
सच्चा सुख चरित्र और कर्म में होता है।
आधुनिक जीवन में कुबेर देव का महत्व
आज भी लोग व्यापार में सफलता के लिए, धनवृद्धि हेतु और आर्थिक स्थिरता के लिए कुबेर की पूजा करते हैं।
वास्तु शास्त्र में भी उत्तर दिशा को कुबेर की दिशा माना गया है।
निष्कर्ष
वैश्रवण से कुबेर बनने की यात्रा त्याग, तपस्या और संघर्ष की मिसाल है।
उन्होंने कठिन तप से देवत्व, स्वर्ण लंका पाया और पुष्पक विमान प्राप्त किया।
यही कारण है कि वे आज भी पूजनीय हैं।
कुबेर की कथा हमें सिखाती है कि सच्चा धन केवल सोने-चांदी में नहीं, बल्कि सदाचार और संयम में होता है।
