
रावण की मां, मौसी और मामाओं का रहस्य
प्रस्तावना
रामायण की कथा में रावण का नाम तो सभी जानते हैं, लेकिन उसके कुल का विस्तार, उसकी मां, मौसी और मामाओं की उत्पत्ति का रहस्य बहुत कम लोगों को पता है। यह वही पीढ़ी थी जिसने अपने बल और अहंकार से देवताओं, ऋषियों और समस्त लोकों में भय फैला दिया था। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे रावण के ननिहाल की उत्पत्ति, सुकेश के पुत्रों के वंश विस्तार और उस घटना के बारे में जिसने आगे चलकर देवताओं को भगवान विष्णु की शरण में जाने पर मजबूर कर दिया। {getToc} $title={Table of Contents}
लंका में राक्षसों का पुनः प्रवेश
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विश्वकर्मा के वचन सुनकर राक्षसराज माल्यवान, सुमाली और माली अने अनुचरों सहित लंका नगरी की ओर प्रस्थान कर गए। त्रिकूट पर्वत पर बसी स्वर्णमयी लंका को देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए और वहीं बस गए। यहीं से उस वंश की नींव मजबूत हुई, जिसने आगे चलकर तीनों लोकों में आतंक फैलाया।
गंधर्वी नर्मदा और तीन तेजस्वी कन्याएं
उस समय नर्मदा नाम की एक गंधर्वी थी। उसकी तीन कन्याएं थीं जो श्री, कीर्ति और ह्री के समान तेजस्वी और सुंदर थीं। यद्यपि वह राक्षस कुल की नहीं थी, फिर भी उसने अपनी तीनों पुत्रियों का विवाह क्रमशः सुकेश राक्षस के तीनों पुत्रों से कर दिया।
उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में हुए इस दिव्य विवाह के बाद तीनों दंपति अत्यंत सुखपूर्वक भोग-विलास में जीवन व्यतीत करने लगे।
माल्यवान की पत्नी सुन्दरी और उसकी संतानें
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तीनों में माल्यवान की पत्नी का नाम सुन्दरी था। वह अत्यंत रूपवती थी। उसके गर्भ से कई पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए:
पुत्रों के नाम:
- विरुपाक्ष
- वज्रमुष्टि
- दुर्मुख
- सुप्तघ्न
- यज्ञकोप
- मत्त
- उन्मत्त
इसके अतिरिक्त सुन्दरी ने एक कन्या को जन्म दिया जिसका नाम अनला था।
सुमाली की पत्नी केतुमती और रावण का ननिहाल
सुमाली की पत्नी का नाम केतुमती था। वह चंद्रमा के समान सुंदर मुख वाली थी और सुमाली उसे प्राणों से भी अधिक चाहता था।
केतुमती से उत्पन्न संतानों ने आगे चलकर रावण के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पुत्रों के नाम:
- प्रहस्त
- अकम्पन
- विकट
- कालिकामुख
- धूम्राक्ष
- दण्ड
- सुपार्श्व
- संहादि
- प्रघस
- भास्कर्ण
पुत्रियों के नाम:
- राका
- पुष्पोत्कटा
- कैकसी (यही आगे चलकर रावण की माता बनी)
- कुम्भीनसी
यहीं से रावण के जन्म की पृष्ठभूमि तैयार होती है, क्योंकि कैकसी आगे चलकर विश्रवा ऋषि से विवाह करती है और रावण, कुंभकर्ण तथा विभीषण का जन्म होता है।
माली की पत्नी वसुदा और उसके पुत्र
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माली की गंधर्वी पत्नी का नाम वसुदा था। वह कमलनयन और अत्यंत रूपशालिनी थी।
उसके गर्भ से चार पुत्र उत्पन्न हुए:
- अनल
- अनिल
- हर
- सम्पाति
ये चारों आगे चलकर विभीषण के मंत्री बने और लंका के प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राक्षसों का बढ़ता आतंक
समय बीतने के साथ माल्यवान, सुमाली और माली अपने सैकड़ों पुत्रों और विशाल राक्षस सेना के साथ अत्यंत शक्तिशाली हो गए। बल के अहंकार में उन्होंने:
- देवताओं को सताना शुरू किया
- ऋषियों के यज्ञ नष्ट किए
- यक्षों और नागों को परेशान किया
- आश्रमों को उजाड़ दिया
- स्वर्ग पर भी अधिकार जमा लिया
वे स्वयं को ही विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य और वरुण बताने लगे। उनका अहंकार चरम पर पहुंच चुका था।
देवताओं की भगवान शिव से पुकार
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राक्षसों के अत्याचार से पीड़ित होकर सभी देवता और महर्षि भगवान शिव की शरण में पहुंचे। उन्होंने विनती की:
“हे प्रभु, ब्रह्मा के वरदान से शक्तिशाली सुकेश के पुत्र हमें अत्यंत कष्ट दे रहे हैं। कृपया उनका संहार कीजिए।”
परंतु भगवान शिव ने कहा कि सुकेश उनके द्वारा अवध्य है, इसलिए वे उसका वध नहीं कर सकते। उन्होंने देवताओं को भगवान विष्णु के पास जाने का निर्देश दिया।
भगवान विष्णु का अभयदान
देवता और ऋषि भगवान विष्णु के पास पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई। उन्होंने बताया कि सुकेश के तीनों पुत्र ब्रह्मा के वरदान के बल पर तीनों लोकों में उत्पात मचा रहे हैं।
देवाधिदेव विष्णु ने उन्हें आश्वासन दिया:
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“मैं माल्यवान, सुमाली और माली को भलीभांति जानता हूं। उन्होंने धर्म की मर्यादा तोड़ी है। अब मैं उनका विनाश करूंगा। तुम सब निश्चिंत हो जाओ।”
भगवान का यह वचन सुनकर सभी देवता प्रसन्न होकर अपने-अपने लोकों को लौट गए।
आगे क्या हुआ?
अब कथा का सबसे रोचक चरण आने वाला है, भगवान विष्णु और राक्षसों का भीषण संघर्ष। अगले भाग में हम जानेंगे कि किस प्रकार भगवान विष्णु ने इन अत्याचारी राक्षसों का दमन किया और कैसे यह घटना आगे चलकर रावण के उदय की भूमिका बनी।